बचपन की अवस्था कच्ची मिटटी की अवस्था है |
कच्ची मिटटी को कैसा भी आकार दिया जा सकता है |
मिटटी पकाने के बाद उसे ढाला नहीं जा सकता |
बचपन में अभिवावक जिस रूप में बच्चों का निर्माण करना चाहें,
कर सकते हैं |
विनम्रता, सहनशीलता, इमानदारी, धैर्य, सामंजस्य आदि
गुणों की शिक्षा अभिभावकों के जीवन से ही बच्चे सीखते हैं |
बच्चे का निर्माता सृष्टि का निर्माता है |
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१. बच्चे को हर बात की सही जानकारी दें |
२. उत्तर देते समय झुंझलाहट से बचें |
३. अच्छी आदतें डालें |
४. स्वावलंबी (independent )बनाएँ |
५. बुरे संपर्कों से दूर रखने का प्रयत्न करें |
६. समझाने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके काम में लें |
७. बच्चे की सहजता ( simplicity ) को सुरक्षित रखें |
जो माता-पिता अपनी संतान को संस्कारी नहीं बनाते है,
वे केवल जन्मदाता माता-पिता हैं |
सही अर्थ में माता-पिता वे हैं,
जो अपनी संतान को सद्संस्कारों में ढालने का प्रयत्न करते हैं |
~ आचार्य श्री तुलसी
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