Wednesday, June 30, 2021

भगवान ?

मैं सेवक तुम स्वामी ?
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जैन दर्शन में भगवान की गुलामी, 
दासता स्वीकार्य नहीं है।
जैन दर्शन सृष्टिकर्ता भगवान को नहीं मानता।
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मनुष्य अपना भविष्य अपने कर्मों से निर्माण करता है।
एक व्यक्ति अपने श्रम से ही सफल बन सकता है और 
ऊंचे के गुणस्थानों (stages of spiritual development)
पर पहुंचकर स्वयं केवली भगवान बन सकता है।

Monday, February 22, 2021

श्राद्ध

श्राद्ध
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जिज्ञासा:
जैन धर्म मे श्राद्ध मान्य नहीं हैं, क्यों?
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उत्तर: बहुत से जैन लोगों के प्रश्न हैं 
कि श्राद्ध मानें या नहीं? 
जैन धर्म श्रमण संस्कृति को मानता है, 
वैदिक संस्कृति मे श्राद्ध मानते हैं।
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हिन्दु धर्म और जैन धर्म अलग हैं। 
बहुत से जैन समझते हैं 
कि हम हिन्दु हैं। 
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जैन धर्म कर्म प्रधान है।
जैसे कर्म वैसी गति।
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पिंड दान करने से या कौवे को खिलाने से 
क्या वो दान पहुंच जाता है, 
यह बात समझ से बाहर है।
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करुणा तो जैन धर्म का गहना (आभूषण) है। 
महावीर प्रभु के रग-रग मे करुणा थी जगत के लिए।
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पूर्वज कोई देव नहीं हैं, 
जैसी उनके कर्म हैं वैसी उनकी गति।
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पूर्वज को पूजा नहीं जाता, 
सिर्फ उन्हें प्रणाम किया जाता है ।

Wednesday, February 17, 2016

गृहस्थों के लिए 'अल्पारम्भ'

गृहस्थों के लिए 'अल्पारम्भ'
- युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी
" हिंसा और जीवन आपस में जुड़े हुए हैं
आचार्यों ने इसीलिए हिंसा के ३ शैलियां बताई
१.अनारंभ - हिंसा की एकदम भी छुट नहीं है |
२. अल्पारंभ - अनावश्यक हिंसा का वर्जन |
३. महारंभ - हिंसा की कोई रुकावट नहीं, हर तरफ से हिंसा |
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गृहस्थ के लिए अल्पारंभ बताया गया है,
कम से कम हिंसा करना "

Tuesday, January 12, 2016

बच्चों को कैसे ढालें

बचपन की अवस्था कच्ची मिटटी की अवस्था है |
कच्ची मिटटी को कैसा भी आकार दिया जा सकता है |
मिटटी पकाने के बाद उसे ढाला नहीं जा सकता |
बचपन में अभिवावक जिस रूप में बच्चों का निर्माण करना चाहें,
कर सकते हैं |
विनम्रता, सहनशीलता, इमानदारी, धैर्य, सामंजस्य आदि
गुणों की शिक्षा अभिभावकों के जीवन से ही बच्चे सीखते हैं |
बच्चे का निर्माता सृष्टि का निर्माता है |
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१. बच्चे को हर बात की सही जानकारी दें |
२. उत्तर देते समय झुंझलाहट से बचें |
३. अच्छी आदतें डालें |
४. स्वावलंबी (independent )बनाएँ |
५. बुरे संपर्कों से दूर रखने का प्रयत्न करें |
६. समझाने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके काम में लें |
७. बच्चे की सहजता ( simplicity ) को सुरक्षित रखें |
जो माता-पिता अपनी संतान को संस्कारी नहीं बनाते है,
वे केवल जन्मदाता माता-पिता हैं |
सही अर्थ में माता-पिता वे हैं,
जो अपनी संतान को सद्संस्कारों में ढालने का प्रयत्न करते हैं |
~ आचार्य श्री तुलसी

Wednesday, December 30, 2015

विरोध को पीठ दिखाओ

विरोध को पीठ दिखाओ !
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यदि कुछ कार्य करेंगे तो विरोध होगा |
विरोध सहे बिना गति नहीं हो सकती |
विरोध के सामने विरोध लेकर बढ़ेंगे तो विरोध बढेगा और
यदि पीठ देकर अपना कार्य करते रहेंगे तो
वह विरोध अपने आप ख़त्म हो जाएगा |

इस उन्नत चिंतन के सशक्त अवलंबन ने
गुरुदेव श्री तुलसी को हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी
और वे विषम स्थितियों एवं विरोधों को टालने में सफल हुए |
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रायपुर एवं चुरू के घटना-प्रसंग इसके प्रबल साक्ष्य हैं |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

Tuesday, December 29, 2015

मुनि मगनलालजी का हाथ का सहारा

अनुभवों का सहारा
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सन १९३६, अगस्त महीना |
तेरापंथ के आठवें आचार्य श्री कालूगणी के देवलोकगमन से २२ वर्ष के युवा,
मुनि श्री तुलसी को आचार्य बनाया गया |
संघ ने विधिवत आचार्य पद पर आसीन का कार्यक्रम रखा |
आगे.....
आचार्य श्री तुलसी के अपने शब्दों में -
" प्रातः कालीन प्रवचन का समय |
मैं आतंरिक संकोच के साथ मंच के पास पहुंचा |
उस पर चढ़ने के लिए चार-पांच सीढियां बनी हुई थी |
मैं उनपर चढ़ने लगा |
मुनि मगनलाल जी ( उम्र ६७ वर्ष ) ने आगे बढ़कर
मुझे अपने हाथ का सहारा देने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया |
मैं भौंचक्क-सा देखता रह गया |
कहां मैं २२ वर्ष का तरुण !
और कहाँ वे ६७ वर्ष के वयोवृद्ध मुनि !
साधू-साध्वियों को विनय और समर्पण का सक्रिय बोधपाठ मिला |
जनता ने विस्मित और मुग्ध होकर उस दृश्य को देखा |
मैंने सोचा - हमारे धर्मसंघ के वयोवृद्ध और अनुभव-समृद्ध मुनि ने
हाथ का सहारा देने के बहाने अपने अनुभवों का सहारा देने का संकेत किया है |"
( नोट - आपके घर या आस-पास में अनपढ़ या कम पढ़े बुजुर्ग होंगे, अनुभव कहीं भी या किसी से भी ले सकते हैं )

Friday, December 25, 2015

साधना में अपेक्षा

साधना में मुख्यतया ४ बातों की अपेक्षा होती है -
१. लक्ष्य की स्पष्टता 
२. पूर्ण निष्ठा 
३. मार्ग की स्पष्टता 
४. लक्ष्य के लिए सब कुछ बलिदान, लक्ष्य के लिए सब कुछ समर्पण और शरीर का भी विस्मरण |
~ आचार्य श्री तुलसी