Saturday, July 13, 2013

सरलता और निश्छलता

कलकत्ता विश्वविद्दालय के विभागाध्यक्ष
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सतकौडी मुखर्जी गुरुदेव के
सरल एवं निश्छल व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए |
---
गुरुदेव से हुई मुलाक़ात को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया -

आचार्य तुलसी की निश्छलता और सरलता के सम्मुख
मैंने स्वयं को शिशु रूप में पाया |
लगा कि उनकी पैनी दृष्टि हम लोगों के अंतस्तल को भेदकर
हमारी कुटिलता और कलुषता को प्रक्षालित कर रही है |
---
विशाल धर्मसंघ का एकछत्र नेतृत्व करते हुए भी पूज्य गुरुदेव ने
बचपन जैसी सरलता और निश्छलता को सुरक्षित रखा,
यह उनकी विशिष्ट साधना का परिणाम था |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी

आर्जव-साधना

आर्जव-साधना
----------------
स्वयं फंसना भोलापन है और
औरों को फंसाना छल है |
सरल व्यक्ति इन दोनों स्थितियों से ऊपर होता है |
पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी की आर्जव-साधना प्रकर्ष पर थी |
अनेक बार उनकी ऋजुता का लोग दुरूपयोग कर लेते |
पर वे सरलता को पवित्रता एवं आत्मालोचन का अपरिहार्य अंग मानते थे |
सरलता की प्रेरणा देने का उनका तरीका भी अदभुत था |
किसी भी घटना प्रसंग को माध्यम बनाकर वे जनता को
सरल एवं पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा दे देते थे |

श्रद्धा !

श्रद्धा !
------
श्रद्धा को परिभाषित करते हुए पूज्य गुरुदेव कहते हैं - -
जिस साधना-पथ को चुन लिया,
उस पर कदम बढाते समय हज़ार कठिनाइयां उपस्थित हो जाएं,
पर एक क्षण के लिए भी मानस विचलित न हो,
इसका नाम है -- --
श्रद्धा !

हमारी बौद्ध परम्परा में भी...

बौद्ध भिक्षु की भावना !!!
------------------------
२ फरवरी १९७१
बीदासर
--------
युगप्रधान सम्मान समारोह में सुप्रसिद्ध विचारक एवं साहित्यकार बौद्ध भिक्षु
श्री भदंत आनंद कौशल्यायन ने अपने अभिभाषण में कहा -
* महान व्यक्ति जिस कुल में जन्म लेता है,
वह कुल धन्य बन जाता है |
* जिस ग्राम या राष्ट्र में जन्म लेता है,
वह ग्राम और राष्ट्र कृतार्थ हो जाता है |
-------------------------------------
आचार्य श्री आज अपने कर्तृत्व और व्यक्तित्व से
'युगप्रधान' आचार्य के रूप में सम्मानित किये जा रहे हैं |
इस प्रसंग में मैं बहुत प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ |
मेरी यह प्रसन्नता और अधिक हो जायेगी,
जब हमारे देश में,
हमारी बौद्ध परम्परा में भी आचार्य तुलसी जैसा व्यक्ति पैदा होगा |

अग्नि के समान !

अग्नि के समान !
-----------------
१ जनवरी १९६८
तिरुवन्नामलै |
मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम् सौन्दरम् कैलाशम्
ने अपने अभिभाषण में कहा -
विश्व में पवित्र करने वाले दो पदार्थ हैं - -
पानी और अग्नि |
पानी दूसरों को पवित्र बनाता है,
पर उनकी गंदगी से स्वयं गन्दा बन जाता है |
अग्नि दूसरों को पवित्र बनाकर भी स्वयं पवित्र रहती है |
आचार्यश्री तुलसी अग्नि के समान औरों को
पवित्र बनाते हुए स्वयं पवित्र रहते हैं |
मैं आपको तिरुवल्लूर का प्रतिरूप मानता हूँ |

भविष्यवाणी !!!

भविष्यवाणी !!!
---------------
वि.स. १९९३ की बात है |
आचार्यश्री तुलसी आचार्य बने ही थे |
उन्हीं दिनों बीकानेर के श्रावक भंवरलालजी रामपुरिया
परम साधक श्री शान्तिविजयजी सूरि के दर्शनार्थ आबू गए |
----------------------------------------------------------
श्री सूरिजी ने उनके समक्ष भविष्यवाणी की थी कि
" आचार्य तुलसी,
जो अभी-अभी आचार्य बने हैं,
* एक दशक में अपने संघ की प्रतिभा का अद्वितीय निखार करेंगे |
* दुसरे दशक में समग्र जैन समाज पर उनका आशातीत प्रभाव पड़ेगा |
* तीसरे और चौथे दशक में क्रमशः हमारे देश में और
अंतरराष्ट्रीय जगत में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी |

अग्नि परीक्षा में खरे....

२ फरवरी १९७१
बीदासर
--------
युगप्रधान सम्मान समारोह में सुप्रसिद्ध विचारक एवं साहित्यकार बौद्ध भिक्षु
श्री भदंत आनंद कौशल्यायन ने अपने अभिभाषण में यह भी कहा -
हज़ारों वर्ष पूर्व या तो जगदम्बा सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी या
रायपुर में आचार्य श्री तुलसी की अग्नि परीक्षा हुई है |
सीता की भांति आचार्यश्री भी कसौटी पर खरे उतरे हैं |

देवता सेवा करते होंगे !

देवता सेवा करते होंगे !
----------------------
२७ जनवरी १९६८
-----------------
तत्कालीन केन्द्रीय परिवहन और जहाजरानी मंत्री डा.राव ने एक साथ
९ आगम ग्रंथों का लोकार्पण करते हुए कहा -
पिछले १००० वर्षों के इतिहास में ऐसा कार्य कहीं नहीं हुआ,
ऐसा मेरा विश्वास है |
आचार्य तुलसी पदयात्रा, प्रवचन, जनसंपर्क, अध्ययन-अध्यापन,
साहित्य-सृजन आदि अनेक कार्य एक साथ कर रहे हैं |
इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि
तीर्थंकरों की तरह इनकी भी देवता सेवा करते होंगे |


कालूगणी से आपका कभी साक्षात्कार हुआ ?

कालूगणी से आपका कभी साक्षात्कार हुआ ?
--------------------------------------------
लाडनूं-प्रवास के दौरान एक रुसी विद्वान गुरुदेव की सन्निधि में पहुंचा |
उसने गुरुदेव से पूछा -
आपके शक्ति-केंद्र पूज्य कालूगणी हैं तो
क्या अब भी आपका सम्बन्ध उनसे जुड़ा हुआ है ?
गुरुदेव ने मुस्कराते हुए कहा -
ऐसा कोई भी दिन खाली नहीं जाता
जब वे मेरी स्मृति में न आएं |
-----------------------------
पुनः उस रुसी भाई ने जिज्ञासा प्रस्तुत की -
कालूगणी से आपका कभी साक्षात्कार हुआ ?
गुरुदेव ने उसकी आँखों में झांकते हुए उत्तर दिया --
प्रत्यक्ष तो नहीं,
पर मुझे ऐसा लगता है कि
वे मेरे हर कार्य में सहयोगी रहते हैं |
उनसे मुझे हर पल प्रेरणा और ऊर्जा मिलती रहती है |
----------------------------------------------------
यह सुनकर वह विदेशी भाई भावविभोर होकर बोला --
गुरुदेव ! आपकी भक्ति और आस्था देखकर मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि
कालूगणी से आपका अनेक भवों (जन्मों ) का सम्बन्ध है |
क्या आपको भी ऐसा आभास होता है ?
गुरुदेव ने स्वीकृति में अपना सिर हिला दिया |
--------------------------------------------
प्रस्तुत वार्तालाप से स्पष्ट है कि
पूज्य गुरुदेव के मन में अपने गुरु के प्रति
कितनी श्रद्धा, लगाव एवं भक्ति थी |

 

विनम्रता का साकार रूप / अभिमान किस बात का

धवल समारोह पर व्यक्त किया उनका संकल्प
विनम्रता का साकार रूप कहा जा सकता है - -
प्राप्त पूजा में और अधिक विनम्र बनूं,
साधना के पथ पर और आगे बढूं,
लोक-कल्याण में और अधिक निमित्त बनूं,
यही संकल्प मेरे अग्रिम जीवन के प्रकाश-दीप होंगे |
===================================
व्यक्ति को अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए स्वाभिमान रखना आवश्यक है |
पर अभिमान अस्तित्व के लिए खतरा है |
पूज्य गुरुदेव कहते थे कि
व्यक्ति अपने आपको ऊंचा और दूसरों को हीन मानकर आत्मोकर्ष करता है,
यह उसका अभिमान है,
आत्महनन है,
जो हिंसा का ही एक रूप है |
---------------------------
उनके अभिव्यक्त विचार हर किसी की अहं चेतना पर चोट करने में सक्षम हैं ---
" मेरे चित्त पर कभी-कभी अभिमान की छाया आ जाती है |
मैं चौंककर उसे देखता हूँ और सोचता हूँ कि
मैं अभिमान किस बात का करूं ?
ज्ञान का ?
संसार में अनेक व्यक्ति ऐसे हैं,
जो अनेक क्षेत्रों में मेरे से अधिक ज्ञानी हैं |
कुछ विषय ऐसे भी हैं,
जिनका मैं ककहरा भी नहीं जानता |
यदि मेरे पास केवलज्ञान होता तो
संभवतः अभिमान का प्रसंग हो सकता था |
पर केवलज्ञानी अभिमानमुक्त होते हैं |
तो क्या तप का अभिमान करूं ?
मैंने तो बेले-तेले ही किये हैं ?
* भगवान् महावीर तो छह-छह माह की तपस्या सहज ही कर लेते थे |
यह भी नहीं तो क्या बुद्धि का अभिमान करूं ?
* अभयकुमार जैसी बुद्धि हो तो भले ही अभिमान किया जा सके,
पर अभयकुमार और स्थूलिभद्र की ७ बहिनों जैसी बुद्धि कहाँ ?
* इसी प्रकार बाहुबलि जैसा बल होता तो
बल पर अभिमान करने का प्रसंग हो सकता था |
* दर्शन की दृष्टि से क्षायक सम्यक्त्व और
चारित्र की दृष्टि से क्षायक चारित्र होता तो
अभिमान का विषय बनता |
* इसी प्रकार सनत्कुमार और मघवागणी जैसा मेरा रूप होता तो
अभिमान का हेतु बनता | अन्यथा रूप का भी क्या अभिमान करना ?
ऐश्वर्य का भी कैसा अभिमान ?
* शालिभद्र जैसा ऐश्वर्य कहाँ ?
------------------------------
मैं तो सोचता रहता हूँ कि
जिन लोगों के पास यह सब था,
उन्हें भी अभिमान नहीं हुआ तो
मेरे पास तो अभिमान करने लायक कुछ है ही नहीं,
फिर अभिमान किस बात का करूँ ?
मेरी स्पष्ट मान्यता है कि
मैं महान हूँ,
आकर्षक वक्ता हूँ,
प्रमुख लेखक हूँ,
कवि हूँ --
ये सब अभिमान के चिन्ह हैं |
साधक को इन सब अहंमान्यताओं से ऊपर उठना चाहिए | 
--------------------------------------------------------
पूज्य गुरुदेव की आत्मतेज युक्त यह अनुभवपूत वाणी
अहंकार की जड़ों पर प्रहार कर विनम्रता की नयी पौध
लगाने में सक्षम होगी,
ऐसा विश्वास है |

सर्वोत्तम प्रसंग

सर्वोत्तम प्रसंग
-----------------
मद्रास !
२८ सितम्बर १९६८ !!
दो जर्मन विद्वान विश्व भ्रमण के लक्ष्य से मद्रास आये |
तेरापंथ भवन के आसपास खड़ी भीड़ को देखकर उनमें जिज्ञासा जगी |
जानकारी प्राप्त होने के बाद वे भवन में दर्शन करने आये |
-----------------
दो-तीन सत्रों में हुई बातचीत के दौरान वे बोले -
आचार्यश्री ! आपसे मिलना हमारे जीवन की अदभुत घटना है |
हमें मालूम ही नहीं था कि
इतने बड़े धर्माचार्य से मिलना इतना सरल है |
हमारे पोप से मिलने के लिए वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ता है |
फिर हमारे जैसे साधारण व्यक्ति तो उनसे मिल ही नहीं पाते |
हमारी इस यात्रा का सर्वोत्तम प्रसंग आपसे मिलने का है |
---------
नोट - इस तस्वीर में "भारत-रत्न" चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की सेवा-दर्शन करते हुए परिलक्षित हैं |
---
राजाजी भारतवर्ष के अंतिम गवर्नर-जनरल थे,
कांग्रेस के बड़े नेता, मद्रास स्टेट के मुख्यमंत्री,
भारत वर्ष के गृहमंत्री और पश्चिम बंगाल के गवर्नर पद पर भी रहे |

राष्ट्रीय एकता

प्रश्न : राष्ट्रीय एकता का क्या अभिप्राय है ?
क्या सम्पूर्ण राष्ट्र अखण्ड रूप में एक हो सकता है ?
यदि नहीं तो आपकी राय में राष्ट्रीय एकता कैसे सध पाएगी ?
उत्तर : राष्ट्रीय एकता सापेक्ष शब्द है |
अनेक राज्यों, शहरों, गांवों में बंटा हुआ राष्ट्र किसी अपेक्षा से ही एक हो सकता है |
जब राष्ट्र में भेद है और उनकी उपयोगिता है तो
निरपेक्ष एकता न तो सध सकती है और
न वह उपयोगी हो सकती है |
---
सापेक्ष एकता का पहला बिंदु है -
देश के नागरिकों की कर्त्तव्यनिष्ठा |
* वे अपने विचारों, कार्यों और व्यवहारों से किसी का अहित न करें |
किसी का हित हो सके या नहीं,
कम से कम अहितकारी प्रवृत्तियों को हतोत्साह कर दिया जाए,
यह भी एक बड़ा काम है |
---
राष्ट्रीय एकता के विघटन का बीज देश के विभाजन के
साथ ही बो दिया गया था |
विगत कुछ दशकों से वह अधिक जोर पकड़ रहा है |
सत्ता-लिप्सा, स्वार्थी मनोभाव, अप्रामाणिकता, एकांगी चिंतन आदि कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं,
जो राष्ट्रीय एकता के प्रासाद की बुनियाद को हिलाने वाली हैं |
साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, अलगाववाद आदि
की मानसिकता भी एकता में बाधक है |
---
जो लोग एकता में रस लेते हैं,
उनका दायित्व है कि
वे विघटनकारी प्रवृत्तियों से स्वयं बचें तथा
औरों को बचाएं |
अन्यथा उनकी आकांक्षा शाब्दिक बनकर रह जाएगी |
आश्चर्य तो इस बात का है कि
राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर भी 
पार्टी पॉलिटिक्स सामने आ रही है |
------
पर यह प्रश्न न तो राजनीति का है और
न धर्मनीति का है |
सभी नीतियों के लोग एक साथ बैठें,
व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर चिंतन करें और
उसकी क्रियान्विति में विलम्ब न करें तो
निश्चित रूप से कोई परिणाम आ सकता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी 

Friday, July 12, 2013

विरोध - आत्मालोचन का निमित्त

विरोध - आत्मालोचन का निमित्त
--------------------------------------
१९५० में बाल दीक्षा को लेकर उठी संघर्ष की लहर ने
बहुत उतार-चढ़ाव देखे |
अनेक झंझावत झेले |
निर्णय परिवर्तन करवाने के लिए तीव्र प्रयास हुए |
आचार्य तुलसी ने अपने ढंग से कुछ सहकर और
कुछ कहकर सबको संभाला |
परिस्थितियों से लोहा लिया |
----------------------------
यह सत्य है कि
संघर्ष को निमंत्रण देना बुद्धिमानी नहीं है तो
प्रगति के परिणामस्वरुप जो आए,
उसे नहीं झेलना भी बुद्धिहीनता है |
अनेकानेक अवरोधों के बावजूद आचार्य तुलसी दुबके नहीं,
विराम लिया पर रुके नहीं |
--------------------------
इस सारे संघर्ष का उपसंहार करते हुए आचार्य तुलसी ने
सरदारशहर की विशाल परिषद् में कहा -
यह विरोध भीषण था
पर मेरे लिए बलवर्द्धक बना |
संघर्ष खतरनाक था,
पर मेरे और संघ के लिए आत्मालोचन का निमित्त बना |
इससे सतर्कता बढी |
साधू-संघ में प्राचीन ग्रंथों व् सिद्धांतों के अध्ययन की अभिरुचि जागी |
सजगता बढी |
पचासों वर्षों के लिए रास्ता सरल हो गया |
इस दृष्टि से मैं इसे एक प्रकार से गुणकारक मानता हूँ |
फिर भी संघर्ष कभी न हो,
वातावरण शांत रहे,
संगठन सुदृढ़ रहे,
मुझे हर वक़्त यही काम्य है |
भिक्षु शासन विजयी है,
विजयी रहे |
साधू-संघ कुशल आचारवान है और
वैसा ही बना रहे,
ऐसी मेरी अभिलाषा है |

जयपुर बाल दीक्षा विरोध

बाह्य संघर्ष का प्रवेश द्वार बना - -
जयपुर बाल दीक्षा विरोध |
भयंकर भूचाल आया |
सरकार तक ने विरोधी समिति को शह दी |
यह स्वर जोर-शोर से प्रसृत होने लगा -
" किसी भी हालत में दीक्षा नहीं होगी |
-------------------------------------
उस समय आचार्य तुलसी पहली बार जयपुर पधारे थे |
संपर्क सूत्र अत्यल्प थे |
फिर भी उनका संकल्प दृढ था |
------------------------------
इधर महिलाओं का हौसला बढ़ा |
उन्होंने पुरे जोश-खरोश के साथ जुलूस निकाला |
जिसकी प्रतिक्रया अनुकूल रही |
वस्तुस्थिति का आकलन करने के बाद यह बात
प्रखर चिंतकों एवं शीर्ष नेताओं के समझ में आ गई कि
विरोध दीक्षा का नहीं है |
वह तो एक माध्यम है |
वस्तुतः विरोध आचार्य तुलसी के प्रभावी व्यक्तित्व एवं
लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों का है |
-----------------------------------
* धीरे-धीरे विरोध के बादल छंटे |
कुहासा हटा और सत्य का सूर्य पुरी दीप्ति के साथ चमकने लगा | 

Thursday, July 11, 2013

लकीर के फ़कीर नहीं थे

लकीर के फ़कीर नहीं थे
-------------------------
आचार्य तुलसी का नेतृत्व काल पूर्ववर्ती आठ आचार्यों से अधिक प्रलंब रहा |
साथ ही अपने पूर्वजों की अपेक्षा अन्तरंग और बाह्य आलोचनाओं की आंच
में भी वे अधिक तपे |
आलोचना उसकी होती है,
जो पहले न हो और पीछे हो जाए अथवा
उसकी होती है,
जो पहले हो और पीछे मिट जाए |
आचार्य श्री तुलसी ने 
कई नई लकीरें खींचीं और
कईयों में परिवर्तन किया |

Happy Birthday !!!

केक काटना, मोमबत्तियां जलाना और बुझाना,
गुब्बारे फोड़ना आदि जैन क्या,
भारतीय संस्कृति के भी अनुकूल नहीं है ?
फिर भी आधुनिकता के नाम पर यह सब चलता है |
क्या यह आंख मूंदकर चलने का अभिनय तो नहीं है ?

भारतीयों की मौलिक विशेषताएं

भारतीयों की मौलिक विशेषताएं
------------------------------------
जिज्ञासा : आपने देश के इस छोर से उस छोर तक लम्बी-लम्बी पदयात्राएं कीं |
लाखों-करोड़ों लोगों से आपका सीधा संपर्क हुआ |
भारतीय मानस में आपको कौन-कौन-सी मौलिक विशेषताएं महसूस हुई ?
गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी : तेरापंथ धर्मसंघ में मुझ तक नौ आचार्य हो चुके हैं |
पूर्ववर्ती आठ आचार्यों की तुलना में मुझे सर्वाधिक पदयात्रा करने का अवसर मिला |
------------------------------
मैंने पंजाब से कन्याकुमारी और
कच्छ से कलकत्ता तक देश में बहुत घूमा हूँ |
यात्रा के दौरान लाखों-करोड़ों लोगों से मिला हूँ |
मैंने भारतीय जनता के मन को पढने का प्रयास किया है |
-------------------------------------------------------
मैं समझता हूँ कि
भारतीय मानस की पहली मौलिक विशेषता है -
संतों के प्रति सहज श्रद्धा और समर्पण का भाव |
यहां का प्रबुद्ध वर्ग धार्मिक क्रियाकाण्डों में आस्थाशील भले ही न हो,
धर्म के प्रति उसकी आस्था प्रगाढ़ है |
मैं यहां तक कह सकता हूं कि
मुझे इस देश में कोई नास्तिक नहीं मिला |
ऐसे लोग भी मुझे मिले,
जिन्होंने प्रथम बार धर्म के प्रति अपनी असहमति प्रकट की |
किन्तु मानवधर्म या अणुव्रत धर्म के रूप में धर्म की व्याख्या
सुनकर वे स्वयं को धार्मिक मानने में
गौरव का अनुभव करने लगे |
----------------------------
दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा का भयंकर विरोध हुआ |
पर मेरी हिंदी को उन्होंने प्रेम से सुना |
मुझे लगा कि
वहां विरोध भाषा का नहीं,
पॉलिटिक्स का था |
-------------------
भारत की मौलिक संस्कृति उत्तर भारत की
अपेक्षा दक्षिण भारत में आज भी जीवंत है |
------------------------------------------
भारतीय जनता की एक विशेषता है --
सहनशीलता |
वह कर्मवाद और भाग्यवाद के सहारे विषम से विषम
परिस्थिति को भी शांति से सहन कर लेती है |
विश्व के दुसरे देशों में छोटी-छोटी बातों को लेकर
क्रांतियां हो जाती हैं,
पर भारतीय लोग बहुत कुछ सहकर भी खामोश रहते हैं |

भाषा बाधक नहीं बनी !

आनाल एनक्कू तमिल तेरीयाद !
आदांनाल हिंदी यिलं पेसूकिरन !!
भाषा बाधक नहीं बनी !!!
----------------------
तमिलनाडु यात्रा के पूर्व मोरारजी देसाई ने आचार्यश्री को निवेदन किया -
दक्षिण में हिंदी का विरोध प्रखर हो रहा है |
इसलिए आप वहां कोई सार्वजनिक कार्यक्रम न करें |
कहीं ऐसा न हो कि
आपका वहां हिंदी भाषण सुनकर छात्र भड़क उठे |
-----------------
अन्नामलै विश्वविद्दालय के प्रोफेसरों के अनुरोध पर आचार्यश्री ने
वहां प्रवचन देने का प्रस्ताव मान्य कर दिया |
--------------------------------------------
अवसरज्ञ आचार्यश्री ने अपने प्रवचन का प्रारम्भ तमिल भाषा के
एक वाक्य से किया -
" एनक्कु तमिल पेस तेरिन्दु इरुन्दाल मिक संतोष इरन्दु इरुक्कुम |
आनाल एनक्कू तमिल तेरीयाद |
आदांनाल हिंदी यिलं पेसूकिरन |"
-------------------------------
इतना सुनते ही छात्रों की ओर से आवाज़ आई -
आप हिंदी में बोलें |
हम आपको हिंदी में ही सुनना चाहेंगे |
विश्वविद्दालय के प्रांगण में हिंदी में प्रवचन करना
पहली और आश्चर्यजनक घटना थी |
------------------------------------
वस्तुतः जहां आत्मा बोलती है,
वहां भाषा मूक बन जाती है |
आचार्यश्री वातावरण को कैसे मोड़ देना चाहिए तथा
किस समय कौन से उपाय को काम में लेना चाहिए,
इसे बखूबी जानते थे |
यही उनके करिश्माई नेतृत्व की विशिष्टता थी |