Wednesday, December 30, 2015

विरोध को पीठ दिखाओ

विरोध को पीठ दिखाओ !
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यदि कुछ कार्य करेंगे तो विरोध होगा |
विरोध सहे बिना गति नहीं हो सकती |
विरोध के सामने विरोध लेकर बढ़ेंगे तो विरोध बढेगा और
यदि पीठ देकर अपना कार्य करते रहेंगे तो
वह विरोध अपने आप ख़त्म हो जाएगा |

इस उन्नत चिंतन के सशक्त अवलंबन ने
गुरुदेव श्री तुलसी को हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी
और वे विषम स्थितियों एवं विरोधों को टालने में सफल हुए |
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रायपुर एवं चुरू के घटना-प्रसंग इसके प्रबल साक्ष्य हैं |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

Tuesday, December 29, 2015

मुनि मगनलालजी का हाथ का सहारा

अनुभवों का सहारा
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सन १९३६, अगस्त महीना |
तेरापंथ के आठवें आचार्य श्री कालूगणी के देवलोकगमन से २२ वर्ष के युवा,
मुनि श्री तुलसी को आचार्य बनाया गया |
संघ ने विधिवत आचार्य पद पर आसीन का कार्यक्रम रखा |
आगे.....
आचार्य श्री तुलसी के अपने शब्दों में -
" प्रातः कालीन प्रवचन का समय |
मैं आतंरिक संकोच के साथ मंच के पास पहुंचा |
उस पर चढ़ने के लिए चार-पांच सीढियां बनी हुई थी |
मैं उनपर चढ़ने लगा |
मुनि मगनलाल जी ( उम्र ६७ वर्ष ) ने आगे बढ़कर
मुझे अपने हाथ का सहारा देने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया |
मैं भौंचक्क-सा देखता रह गया |
कहां मैं २२ वर्ष का तरुण !
और कहाँ वे ६७ वर्ष के वयोवृद्ध मुनि !
साधू-साध्वियों को विनय और समर्पण का सक्रिय बोधपाठ मिला |
जनता ने विस्मित और मुग्ध होकर उस दृश्य को देखा |
मैंने सोचा - हमारे धर्मसंघ के वयोवृद्ध और अनुभव-समृद्ध मुनि ने
हाथ का सहारा देने के बहाने अपने अनुभवों का सहारा देने का संकेत किया है |"
( नोट - आपके घर या आस-पास में अनपढ़ या कम पढ़े बुजुर्ग होंगे, अनुभव कहीं भी या किसी से भी ले सकते हैं )

Friday, December 25, 2015

साधना में अपेक्षा

साधना में मुख्यतया ४ बातों की अपेक्षा होती है -
१. लक्ष्य की स्पष्टता 
२. पूर्ण निष्ठा 
३. मार्ग की स्पष्टता 
४. लक्ष्य के लिए सब कुछ बलिदान, लक्ष्य के लिए सब कुछ समर्पण और शरीर का भी विस्मरण |
~ आचार्य श्री तुलसी