मैं सेवक तुम स्वामी ?
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जैन दर्शन में भगवान की गुलामी,
दासता स्वीकार्य नहीं है।
जैन दर्शन सृष्टिकर्ता भगवान को नहीं मानता।
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मनुष्य अपना भविष्य अपने कर्मों से निर्माण करता है।
एक व्यक्ति अपने श्रम से ही सफल बन सकता है और
ऊंचे के गुणस्थानों (stages of spiritual development)
पर पहुंचकर स्वयं केवली भगवान बन सकता है।
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