अनुभवों का सहारा
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सन १९३६, अगस्त महीना |
तेरापंथ के आठवें आचार्य श्री कालूगणी के देवलोकगमन से २२ वर्ष के युवा,
मुनि श्री तुलसी को आचार्य बनाया गया |
संघ ने विधिवत आचार्य पद पर आसीन का कार्यक्रम रखा |
आगे.....
आचार्य श्री तुलसी के अपने शब्दों में -
" प्रातः कालीन प्रवचन का समय |
मैं आतंरिक संकोच के साथ मंच के पास पहुंचा |
उस पर चढ़ने के लिए चार-पांच सीढियां बनी हुई थी |
मैं उनपर चढ़ने लगा |
मुनि मगनलाल जी ( उम्र ६७ वर्ष ) ने आगे बढ़कर
मुझे अपने हाथ का सहारा देने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया |
मैं भौंचक्क-सा देखता रह गया |
कहां मैं २२ वर्ष का तरुण !
और कहाँ वे ६७ वर्ष के वयोवृद्ध मुनि !
साधू-साध्वियों को विनय और समर्पण का सक्रिय बोधपाठ मिला |
जनता ने विस्मित और मुग्ध होकर उस दृश्य को देखा |
मैंने सोचा - हमारे धर्मसंघ के वयोवृद्ध और अनुभव-समृद्ध मुनि ने
हाथ का सहारा देने के बहाने अपने अनुभवों का सहारा देने का संकेत किया है |"
( नोट - आपके घर या आस-पास में अनपढ़ या कम पढ़े बुजुर्ग होंगे, अनुभव कहीं भी या किसी से भी ले सकते हैं )
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