Thursday, July 11, 2013

भारतीयों की मौलिक विशेषताएं

भारतीयों की मौलिक विशेषताएं
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जिज्ञासा : आपने देश के इस छोर से उस छोर तक लम्बी-लम्बी पदयात्राएं कीं |
लाखों-करोड़ों लोगों से आपका सीधा संपर्क हुआ |
भारतीय मानस में आपको कौन-कौन-सी मौलिक विशेषताएं महसूस हुई ?
गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी : तेरापंथ धर्मसंघ में मुझ तक नौ आचार्य हो चुके हैं |
पूर्ववर्ती आठ आचार्यों की तुलना में मुझे सर्वाधिक पदयात्रा करने का अवसर मिला |
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मैंने पंजाब से कन्याकुमारी और
कच्छ से कलकत्ता तक देश में बहुत घूमा हूँ |
यात्रा के दौरान लाखों-करोड़ों लोगों से मिला हूँ |
मैंने भारतीय जनता के मन को पढने का प्रयास किया है |
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मैं समझता हूँ कि
भारतीय मानस की पहली मौलिक विशेषता है -
संतों के प्रति सहज श्रद्धा और समर्पण का भाव |
यहां का प्रबुद्ध वर्ग धार्मिक क्रियाकाण्डों में आस्थाशील भले ही न हो,
धर्म के प्रति उसकी आस्था प्रगाढ़ है |
मैं यहां तक कह सकता हूं कि
मुझे इस देश में कोई नास्तिक नहीं मिला |
ऐसे लोग भी मुझे मिले,
जिन्होंने प्रथम बार धर्म के प्रति अपनी असहमति प्रकट की |
किन्तु मानवधर्म या अणुव्रत धर्म के रूप में धर्म की व्याख्या
सुनकर वे स्वयं को धार्मिक मानने में
गौरव का अनुभव करने लगे |
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दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा का भयंकर विरोध हुआ |
पर मेरी हिंदी को उन्होंने प्रेम से सुना |
मुझे लगा कि
वहां विरोध भाषा का नहीं,
पॉलिटिक्स का था |
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भारत की मौलिक संस्कृति उत्तर भारत की
अपेक्षा दक्षिण भारत में आज भी जीवंत है |
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भारतीय जनता की एक विशेषता है --
सहनशीलता |
वह कर्मवाद और भाग्यवाद के सहारे विषम से विषम
परिस्थिति को भी शांति से सहन कर लेती है |
विश्व के दुसरे देशों में छोटी-छोटी बातों को लेकर
क्रांतियां हो जाती हैं,
पर भारतीय लोग बहुत कुछ सहकर भी खामोश रहते हैं |

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