प्रश्न : राष्ट्रीय एकता का क्या अभिप्राय है ?
क्या सम्पूर्ण राष्ट्र अखण्ड रूप में एक हो सकता है ?
यदि नहीं तो आपकी राय में राष्ट्रीय एकता कैसे सध पाएगी ?
उत्तर : राष्ट्रीय एकता सापेक्ष शब्द है |
अनेक राज्यों, शहरों, गांवों में बंटा हुआ राष्ट्र किसी अपेक्षा से ही एक हो सकता है |
जब राष्ट्र में भेद है और उनकी उपयोगिता है तो
निरपेक्ष एकता न तो सध सकती है और
न वह उपयोगी हो सकती है |
---
सापेक्ष एकता का पहला बिंदु है -
देश के नागरिकों की कर्त्तव्यनिष्ठा |
* वे अपने विचारों, कार्यों और व्यवहारों से किसी का अहित न करें |
किसी का हित हो सके या नहीं,
कम से कम अहितकारी प्रवृत्तियों को हतोत्साह कर दिया जाए,
यह भी एक बड़ा काम है |
---
राष्ट्रीय एकता के विघटन का बीज देश के विभाजन के
साथ ही बो दिया गया था |
विगत कुछ दशकों से वह अधिक जोर पकड़ रहा है |
सत्ता-लिप्सा, स्वार्थी मनोभाव, अप्रामाणिकता, एकांगी चिंतन आदि कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं,
जो राष्ट्रीय एकता के प्रासाद की बुनियाद को हिलाने वाली हैं |
साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, अलगाववाद आदि
की मानसिकता भी एकता में बाधक है |
---
जो लोग एकता में रस लेते हैं,
उनका दायित्व है कि
वे विघटनकारी प्रवृत्तियों से स्वयं बचें तथा
औरों को बचाएं |
अन्यथा उनकी आकांक्षा शाब्दिक बनकर रह जाएगी |
आश्चर्य तो इस बात का है कि
राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर भी
क्या सम्पूर्ण राष्ट्र अखण्ड रूप में एक हो सकता है ?
यदि नहीं तो आपकी राय में राष्ट्रीय एकता कैसे सध पाएगी ?
उत्तर : राष्ट्रीय एकता सापेक्ष शब्द है |
अनेक राज्यों, शहरों, गांवों में बंटा हुआ राष्ट्र किसी अपेक्षा से ही एक हो सकता है |
जब राष्ट्र में भेद है और उनकी उपयोगिता है तो
निरपेक्ष एकता न तो सध सकती है और
न वह उपयोगी हो सकती है |
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सापेक्ष एकता का पहला बिंदु है -
देश के नागरिकों की कर्त्तव्यनिष्ठा |
* वे अपने विचारों, कार्यों और व्यवहारों से किसी का अहित न करें |
किसी का हित हो सके या नहीं,
कम से कम अहितकारी प्रवृत्तियों को हतोत्साह कर दिया जाए,
यह भी एक बड़ा काम है |
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राष्ट्रीय एकता के विघटन का बीज देश के विभाजन के
साथ ही बो दिया गया था |
विगत कुछ दशकों से वह अधिक जोर पकड़ रहा है |
सत्ता-लिप्सा, स्वार्थी मनोभाव, अप्रामाणिकता, एकांगी चिंतन आदि कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं,
जो राष्ट्रीय एकता के प्रासाद की बुनियाद को हिलाने वाली हैं |
साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, अलगाववाद आदि
की मानसिकता भी एकता में बाधक है |
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जो लोग एकता में रस लेते हैं,
उनका दायित्व है कि
वे विघटनकारी प्रवृत्तियों से स्वयं बचें तथा
औरों को बचाएं |
अन्यथा उनकी आकांक्षा शाब्दिक बनकर रह जाएगी |
आश्चर्य तो इस बात का है कि
राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर भी
पार्टी पॉलिटिक्स सामने आ रही है |
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पर यह प्रश्न न तो राजनीति का है और
न धर्मनीति का है |
सभी नीतियों के लोग एक साथ बैठें,
व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर चिंतन करें और
उसकी क्रियान्विति में विलम्ब न करें तो
निश्चित रूप से कोई परिणाम आ सकता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी
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पर यह प्रश्न न तो राजनीति का है और
न धर्मनीति का है |
सभी नीतियों के लोग एक साथ बैठें,
व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर चिंतन करें और
उसकी क्रियान्विति में विलम्ब न करें तो
निश्चित रूप से कोई परिणाम आ सकता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी
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